2014 का वारणा का दंगल
दिल्ली से २ हज़ार किलोमीटर दूर , बहुत दूर , मुझे याद हैं की मेरा मन मयूर नाच उठा था , उन्होंने मुझसे कहा आओ हमारे साथ वक्त बिताओ नाचो गाओ , मुझे याद है की मै खुश था , जब उन्होंने कहा दोस्त अभी आप नहीं जा सकते , मेरे साथ आओ उन गीतों को गायें जिन्हे हम पसंद करते हैं। मुझे विश्वाश नहीं हुआ।
नंदुरबार के बंटी चौधरी मेरे वही मित्र हैं , जिन्होंने वारणा के दंगल में आने का मुझे निमंतरण ही नहीं दिया , मुझे उधर की धरती , उस धरती के लोगों , खान पान , और विशेषताओं से परिचित कराया। वहीँ मुझे मिलने प्रमोद दाने और गणेश भाई भी आये। प्रमोद भाई मुझे और दूर ले जाना चाहते , लेकिन समयाभाव के कारण संभव न हो सका। उन्हें वचन दिया की अगली बार आपके साथ रहूँगा।
बंटी चौधरी भाई के घर पर ठहरा जहाँ पर उनकी छोटी सी प्यारी सी फैमिली हैं , उनकी धर्मपत्नी हमारी बहन के हाथों महाराष्ट्रियन खाना खाया , उनके हाथों की चाय तो लाजवाब थी। उधर बंटी भाई ने कपिल भाई , नायब कुरैशी , और जकात गुरु जी से मिलवाया। जब हम वारणा दंगल से लौटे तो जकात गुरु जी ने अपने घर पर बेहतरीन दावत दी , उनका बहुत -२ शुक्रिया। घंटों महाराष्ट्र में कुश्ती पर बातें हुई।
यूँ तो बहुत मित्रों ने वारणा में मिलने का वादा किया पर जो भी मिले , बड़े आतिथ्य सत्कार और प्रेम से मिले ,उनके मित्रवत व्यवहार से मुझे बहुत प्रेरणा और सीख मिली।